वन्यजीव संरक्षण अधिनियम मामले में राज्य की अपील खारिज, अधिकारियों से वसूली के निर्देश
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के एक मामले में राज्य द्वारा गलत अदालत में अपील दायर करने पर कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विधि का समुचित अध्ययन किए बिना अपील दायर करना न्यायालय के समय और सरकारी संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी है। अपील हाईकोर्ट ने दाखिल करना थी, लेकिन ऐसा करने के बजाए वह एडिशनल सेशन जज की कोर्ट में दाखिल की गई। इस रवैये को आड़े हाथों लेते हुए अदालत ने अपील खारिज कर सरकार पर 10 हजार का जुर्माना ठोका है।
क्या था मामला
मामला वर्ष 2006 के अपराध से जुड़ा है, जिसमें सागौन (सागुन) की लकड़ी जब्त की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने 30 नवंबर 2010 को आरोपी जुगल किशोर को दोषमुक्त कर दिया था, जबकि सह-आरोपी लल्लू गोंड को दोषी ठहराया गया था। राज्य सरकार ने 2 मई 2011 को अपील दायर की, लेकिन पन्ना की प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने यह कहते हुए अपील खारिज कर दी कि उसे इस मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र (जुरिस्डिक्शन) नहीं है।
सीधे हाईकोर्ट में होना थी अपील
जस्टिस सिंह ने कहा- यदि मामला वन अधिकारी की निजी शिकायत पर दर्ज हुआ था, तो दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील सीधे हाईकोर्ट में दायर की जानी चाहिए थी, न कि सत्र न्यायालय में। ऐसे मामलों में अपील का प्रावधान धारा 378(4) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अपील मेमो में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि निचली अदालत का आदेश विधि विरुद्ध कैसे था। इससे प्रतीत होता है कि अपील “बिना विधिक परीक्षण और उचित विचार” के जल्दबाजी में दायर की गई।
10 हजार रुपये कॉस्ट, अअफसरों से वसूली की छूट
हाईकोर्ट ने रिवीजन याचिका को निरस्त करते हुए राज्य सरकार पर 10,000 रुपये की लागत लगाई। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि राज्य चाहे तो यह राशि उन संबंधित अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से वसूल सकता है, जिन्होंने शुरुआत से अंत तक इस गलत अपील को दायर करने में भूमिका निभाई।
हाईकोर्ट का आदेश देखें CRR-2105-2013
